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समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) : कब तक होगा लागु ? एक तटस्थ और न्यायिक निरिक्षण


        
समान नागरिक संहिता  (Uniform Civil Code) भारत में मौजूद विभिन्न धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws)को सभी नागरिकों के लिए समान कानूनों के साथ बदलने का एक प्रस्ताव है। भारत के २२ वे विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता  (Uniform Civil Code) के संबंध में जनता से नए सिरे से विचार और प्रस्ताव मांगे हैं। यूसीसी भारत में एक अत्यधिक विवादित और राजनीतिक मुद्दा होने के बाद भी इसपर बनायीं गयी कमिटी सम्भ्रम में है.


    क्या है व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) : 

        वर्तमान में, हिंदू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और यहूदी अपने निजी कानूनों द्वारा शासित होते हैं ।व्यक्तिगत कानून धार्मिक पहचान के आधार पर निर्धारित होते हैं। जैसे की हिन्दू समाज के लोगों केलिए विवाह, तलाक, सम्पति का विभाजन, दत्तक विधि, उत्तराधिकारी तथा विरासत - वसीहयत के संबंधी अलग नियम स्थापित किये गए है जो पारम्परिक धारणा, सामाजिक मान्यता तथा धार्मिक शास्त्रों के आधार पर निर्धारित है. जब की मुस्लिम समाज के लोगोंकेलिए यही विषयों के सम्बन्ध में हिन्दू समुदाय से अलग नियम है जो उनके पारंपरिक धारणा, सामाजिक मान्यता तथा धार्मिक शास्त्रों के आधार पर निर्धारित है. समाज के हर एक भागीदार को एकसाथ चलने, उन्हें  सामान स्थान और न्याय प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले यह विषय समाज के हर एक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते है. फ़िलहाल उपरोक्त विषयोंके न्यायिक मामलों के निपटान तथा संसद और विधान भवन में नए कायदे इन्ही व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) को ध्यान में रखकर किये जाते है.  

    समान नागरिक संहिता क्या है?

        समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान के  अनुच्छेद 44 में उल्लेखित है , जो राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों  को संदर्भित करता है. सभी धर्मों के लिए ‘समान नागरिक संहिता’ बनाने का निर्देश देता है। कुल मिलाकर अनुच्छेद 44 का उद्देश्य कमजोर वर्गों से भेदभाव की समस्या को खत्म करके देशभर में विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के बीच तालमेल बढ़ाना है। सामान नागरी संहिता लागु करने से समाज के हर समुदाय को उपरोक्त विषयोंके संदर्भित एक ही तरह के नियम से न्याय प्रदान होगा; सामान नागरी संहिता के नियम संतुलित और समकालीन होंगे जो विषेशतः लैंगिक भेदभाव और नष्ट करने हेतु सक्षम होंगे.  इसका मतलब यह है कि उदहारण परक हिन्दू समुदाय के विवाह और तलाक हिंदू विवाह अधिनियम (1955) के अनुसार तथा गोद  लेने की प्रक्रिया हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) के अनुसार नियमित होती है; लेकिन सामान नागरी संहिता लागु होने पर उपरोक्त अधिनियम जो हिन्दू समुदाय के  व्यक्तिगत कानून माने जाते है तकनीकी रूप से भंग या बंद हो जाएंगे और उनको एक ही नियम से अनुपालित जायेगा. 

समान नागरिक संहिता लागु करने योग्य कारण और इसकी उपयोगिता :

1 . शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं। अलग-अलग धर्मों के अलग अलग कानून होने से न्याय प्रदान करते समय व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) को ध्यान में रखकर न्याय कारन पड़ता है जिसमे न्यायपालिका का बहूत समय खर्च होता है और न्याय व्यवस्था पर बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे तथा  विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न होने वाले सांप्रदायिक विवादों में भी कमी आएगी।

२. समान नागरिक संहिता विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के तहत महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न को दूर करके लैंगिक न्याय और समानता सुनिश्चित करेगा ।यह विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने, भरण-पोषण आदि के मामलों में महिलाओं को समान अधिकार और दर्जा प्रदान करेगा।यह महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाली पितृसत्तात्मक और प्रतिगामी प्रथाओं को चुनौती देने के लिए भी सशक्त बनाएगा। यह सभी के लिए समानता, भाईचारा और सम्मान के संवैधानिक मूल्यों को कायम रखेगा ।

३. न्यापालिका न्याय प्रदान करते समय और संसद / विधान भवन कानून बनाते समय धार्मिक न्याय तो सुनिश्चित करने की कोशिश करते है लेकिन लैंगिक और विशिष्ट वर्ग हेतु भेदभाव उत्पन्न होता है. समान नागरिक संहिता लागु होने पर सभी लिंंग को तथा वर्ग को एक समान ध्यान में रखकर यह भेदभाव नष्ट किया जा सकता है जो समकालीन कल्याणकारी राज्य के दिशा में असरदार कदम होगा.

४. समान नागरिक संहिता कई व्यक्तिगत कानूनों की जटिलताओं और विरोधाभासों को दूर करके कानूनी प्रणाली को सरल और तर्कसंगत बनाएगा; यह विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न होने वाली विसंगतियों और खामियों को दूर करके नागरिक और आपराधिक कानून को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ और समझने योग्य बना देगा।जिससे प्रशासनिक समस्याएं कम हो जाएगी. 

५. समान नागरिक संहिता कुछ व्यक्तिगत कानूनों में प्रचलित पुरानी और प्रतिगामी प्रथाओं का आधुनिकीकरण और सुधार करेगा। यह सभी धर्मोंके उन प्रथाओं और पुरुषप्रधान विशेषाधिकारों को खत्म कर देगा जो भारत के संविधान में निहित मानवाधिकारों और मूल्यों के खिलाफ हैं , जैसे तीन तलाक, बहुविवाह, बाल विवाह आदि।यह बदलती सामाजिक वास्तविकताओं और समकालीन समाज के जरूरतों  को भी समाविष्ट करेगा।

६. समान नागरिक संहिता - यूसीसी सभी नागरिकों के बीच एक समान पहचान और अपनेपन की भावना पैदा करके राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देगा । सभी के लिए कानून में एक समानता से ‘हम भारतीय’ संकल्पना को बढ़ावा मिलेगा और  नागरिको में राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। 

    समान नागरिक संहिता के लागु करने से कानूनी प्रणाली का सरलीकरण और एकीकरण, लैंगिक न्याय और समानता, पुरानी और प्रतिगामी प्रथाओं में सुधार तथा राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता साध्य करे की कोशिश की जाएगी।

समान नागरिक संहिता के लागु करने विरोधित शंका और तथ्य :

1 . शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए धर्म आधारित अलग कानून है, जिसे हर व्यक्ति को अनुनय करने की स्वतंत्रता संविधान ने दी है. यह अधिकार देश के अंदर विविधता में एकता का प्रतिनिधित्व करनेवाला घटक माना जा सकता है. परन्तु इस विषयोंमें एक जैसा कानून लागु करने पर संविधान की उपरोक्त विशेषता ख़त्म होकर व्यक्ति स्वतंत्रता में बाधा आएगी ।




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